Poem…The disclosure…. Dr shyam gupt

Posted in बिना श्रेणी on मार्च 17, 2012 by drsbg

Let me that untold story disclose,

I too wished you to offer a Rose.

 

Don’t know why today my thumping heart,

Remember those lovely days in past.

 

I don’t know why these eyes always,

Kept following you at every place.

 

My body my mind my life & soul,

Were ready to bow in love as whole.

 

The question to remember you did not arise,

You were never forgotten to your surprise.

 

Those longing though fainted with the time,

Still they taste like soda with lime.

 

Is there a limit of age & time for Rose,

But the tale of age is not to disclose.

 

 

 

 

DOCTOR PATIENT RELATIONSHIP IN VEDIK ERA

Posted in बिना श्रेणी on दिसम्बर 19, 2010 by drsbg
DOCTOR PATIENT RELATIONSHIP IN VEDIK ERA
( Dr Shyam gupta )
The much discussed subject of today has been well described in the worls oldest literature, The Rigved, glimpses of the same can be seen in following verses–

Defining Doctors-
The verse 10/97/6 says–  ” यस्तेषधी: समsमत राजान: समिता विव । विप्र स उच्यते भिषुगुक्षोहामीव चातनः ॥”  it means , One who posess medicine is called physician and all around whome the medicins reach like people around a king; learned call him physician. He only can relieve the sick and diseased. Hence Doctors well versed in all the faculties can only be able to treat better & successfully.
Responsibilities of Doctors—

1. Treating sick persons– verse 8/22/6512 says–” साभिर्नो  मक्षू तूयमश्विना गतं  भिष्ज्यतम  यदातुरम |’  means  O ashvini kumaars !( The  doctors  ), you are well versed to protect and promote the welfare, maintainance  & supply system of society; with same efficacy and keenness also attend and treat the sick people in emergencies.
2. Welfare–The verse 8/22/6506 says—“युवोरथस्य परिचक्रमीयत इमान्य द्वामिषण्यति । अस्मा अच्छा सुमतिर्वा सुभस्पती आधेनुरिव धावति ॥”— The one wheel of divine chariot( Divy rath—health & care system) of Ashvini kumars remain with them and other in the world. His wisdom like cows  is for the welfare of people. Hence the Doctors should keep themselves well aware of the problems of society at large & be ready to put themselves  to service of society.

3. Home visits by doctors —The verse 8/5/6100 says– ” महिष्ठां वाज्सातमेषयन्ता शुभस्पती गन्तारा दाषुषो गृहम |”   Ashvini kumaars themselves attend at the residense of the noble peoples for their welfare.
4.Self visits — according to verse 8/5/6117–“कदां वा तोग्र्यो विधत्समुद्रोजहितो नरा । यद्वा रथो विभिथतात ॥’” o ashvini kumars ! drowned  in the ocean (of sickness )
was the Bhujyu ( A king ) who never called you for help ,but you saved him by reaching on his own. ..The doctor , if comes to knoe about diseased person from any source, should exend help even without called.
Responsibilities of sick & public towards Doctors—-
1. ashvini kumars The physician God duo , is prayed  in rig ved ( 10/97/6130) as ..”धीजवना नासत्या..” The God like ones own wisdome & truth. The words & advises  of the doctors , should be believed & accepted by the people as his own wisdom and final truth. They must be relied upon.
2. As par rig ved 10/97/4. which read…”औषधीरिति मातरस्तद्वो देवीरूप ब्रुवे । सनेयंअश्वं गां वास आत्मानां तब पूरुषः ॥”  Medicines are like mother bestowed with super powers;  O physician ! I offer you cows, horses,clothings & even myself. The services of Doctors can not match with any cost.

———- Dr Shyam Gupta.

चाहत….डा श्याम गुप्त की गज़ल…..

Posted in बिना श्रेणी on नवम्बर 29, 2010 by drsbg

डा श्याम गुप्त की ग़ज़ल…

तुमको देखा तुमको जाना तुमको चाहा ज़ाना।
जानकर आपको कुछ और नहीं जाना, ज़ाना। 

आपकी चाह में कुछ और की चाहत न रही,
तेरी चाहत को ही पूजा और पूजा जाना।

चाह में आपकी चाहत का मिला सारा जहां,
चाह का एसा असर चाह के तुमको जाना ।

चाह में दर्द ही चाहत का सुकूँ बन जाए,
चाहकर आपको चाहत को यूं जाना, ज़ाना ।

ज़िक्र तेरा, तेरी चाहत का श्याम’ होगा जब जब,
दर्दे-दिल, दर्दे-सुकूँ का भी बयाँ होगा ज़ाना

karm abhinandan—poem

Posted in बिना श्रेणी on अगस्त 6, 2010 by drsbg

मेरे देश में कोई भूखा नहीं…

Posted in literature on अगस्त 6, 2010 by drsbg

मेरे देश में,

अब कोई भूख से नहीं मरता;

क्योंकि, अब-

देश में बडे बडे बिज़नेस स्कूल हैं,

शाही ठाठ बात से सज़े, आई आई एम व

बहुराष्ट्रीय कम्पनियां हैं;

जो अरबों कमाती हैं, और-

उनके कर्मचारी भी लाखों पाते हैं ।

सरकाआरी कर्मचारी तो ,

सिर्फ़ ड्यूटी पर विदेश जाते हैं;

ये काम तो देश में करते हैं, पर-

पुरस्कार लेने मलयेशिया जाते हैं।


मेरे देश की चमचमाती सडकों पर, प्रतिपल-

तमाम कार, स्कूटर, व टेक्सियां फ़र्राटा भरतीं हैं; और–

पटरियों पर, वातानुकूलित शताब्दी,

राजधानी एक्स्प्रेस व मैट्रो दौडती हैं।


मेरे देश मे अब-

बडे बडे ’मौल ’ सुपर बाज़ार व,

बहुमन्ज़िली इमारतों का मेला है।

हर जगह कोल्ड ड्रिन्क्स, ठन्डा, काफ़ी,

फ़ास्ट फ़ूड,पिज़्ज़ा , बर्गर, आइसक्रीम, व-

ब्रान्डेड आइटम का रेलम पेला है।

टी वी, रडियो, केबुल पर-

आइटम सोन्ग, आइटम डान्स, व-

आइटम कन्याओं का ठेलम ठेला है।


यहां हर गली में ’गुरू’ हैं

हर कोई किसी न किसी का

चमचा या चेला है ।


भूखा वही मरता है,

जो हठेला है,

शान्त स्वाधीन अकेला है,

जुबान का करेला है,

जिसका न कोई गुरू-

न चमचा न चेला है ॥


तुम तुम और तुम, डा श्याम गुप्त की कविता–

Posted in बिना श्रेणी on जून 7, 2010 by drsbg

सकल रूप रस भाव अवस्थित , तुम ही तुम हो सकल विश्व में |
सकल विश्व तुम में स्थित प्रिय,अखिल विश्व में तुम ही तुम हो |
तुम तुम तुम तुम , तुम ही तुम हो,तुम ही तुम हो तुम ही तुम हो ||

तेरी वींणा के ही नाद से, जीवन नाद उदित होता है |
तेरी स्वर लहरी से ही प्रिय,जीवन नाद मुदित होता है |

ज्ञान चेतना मान तुम्ही हो ,जग कारक विज्ञान तुम्ही हो |
तुम जीवन की ज्ञान लहर हो,भाव कर्म शुचि लहर तुम्ही हो |

अंतस मानस या अंतर्मन ,अंतर्हृदय तुम्हारी वाणी |
अंतर्द्वंद्व -द्वंद्व हो तुम ही , जीव जगत सम्बन्ध तुम्ही हो |

तेरा प्रीति निनाद न होता , जग का कुछ संबाद न होता |
जग के कण कण भाव भाव में,केवल तुम हो,तुम ही तुम हो |

जग कारक जग धारक तुम हो,तुम तुम तुम तुम, तुम ही तुम हो |
तुम तुम तुम तुम, तुम ही तुम हो,तुम ही तुम हो,तुम ही तुम हो |

तुम्ही शक्ति, क्रिया, कर्ता हो, तुम्ही ब्रह्म इच्छा माया हो |
इस विराट को रचने वाली, उस विराट की कृति काया हो |

दया कृपा अनुरक्ति तुम्ही हो, ममता माया भक्ति तुम्ही हो |
अखिल भुवन में तेरी माया,तुझ में सब ब्रह्माण्ड समाया |

गीत हो या सुर संगम हे प्रिय!, काव्य कर्म हो या कृति प्रणयन |
सकल विश्व के गुण भावों में, तुम ही तुम हो,तुम ही तुम हो |

तेरी प्रीति-द्रिष्टि का हे प्रिय, श्याम तन मन पर साया हो |
मन के कण कण अन्तर्मन में, तेरी प्रेम -मयी छाया हो ।

स्रिष्टि हो स्थिति या लय हो प्रिय!, सब कारण का कारण, तुम हो ।
तुम ही तुम हो,तुम ही तुम हो,तुम तुम तुम तुम प्रिय, तुम ही तुम हो ॥

निकसो न नंदलाल—

Posted in saahity -english and hindi on मार्च 15, 2010 by drsbg

मींडि दिए गाल, लाल, हाथ में भरे गुलाल |

नैन भरे दोऊ,  गुलाल और नन्द लाल |

सखि, किये जतन, गुलाल तौ निकासी गयो ,

कज़रारे नैन दुरियो,  निकसो न नंदलाल||

कारे कारे नैन छुपे, कारे कारे नंदलाल |

लाज शरम हिये भये गोरी के नैन लाल |

भाव भरे अंसुअन की गैल ढरि गयो गुलाल,

ऐसो ढीठ जसुमति कौ,निकसो न नंदलाल |

एरी सखि! बंद करूँ, खोलूँ या पलक झपूं |

निकसे निकासे ते न आंखि ते गोपाल लाल |

जाने बसों हिये, जानें चित में समय गयो,

करि करि जतन हारी, निकसो न नंदलाल ||

निकसे निकासे ते न, राधे नैन भये लाल |

लाल लाल नैनन में , कैसे छुपे नंदलाल |

नैन ते निकसि गयो, उर में समायो जाय ,

राधे कहें मुसुकाय, निकसौ न नंदलाल || –