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मेरे देश में कोई भूखा नहीं…

Posted in literature on अगस्त 6, 2010 by drsbg

मेरे देश में,

अब कोई भूख से नहीं मरता;

क्योंकि, अब-

देश में बडे बडे बिज़नेस स्कूल हैं,

शाही ठाठ बात से सज़े, आई आई एम व

बहुराष्ट्रीय कम्पनियां हैं;

जो अरबों कमाती हैं, और-

उनके कर्मचारी भी लाखों पाते हैं ।

सरकाआरी कर्मचारी तो ,

सिर्फ़ ड्यूटी पर विदेश जाते हैं;

ये काम तो देश में करते हैं, पर-

पुरस्कार लेने मलयेशिया जाते हैं।


मेरे देश की चमचमाती सडकों पर, प्रतिपल-

तमाम कार, स्कूटर, व टेक्सियां फ़र्राटा भरतीं हैं; और–

पटरियों पर, वातानुकूलित शताब्दी,

राजधानी एक्स्प्रेस व मैट्रो दौडती हैं।


मेरे देश मे अब-

बडे बडे ’मौल ’ सुपर बाज़ार व,

बहुमन्ज़िली इमारतों का मेला है।

हर जगह कोल्ड ड्रिन्क्स, ठन्डा, काफ़ी,

फ़ास्ट फ़ूड,पिज़्ज़ा , बर्गर, आइसक्रीम, व-

ब्रान्डेड आइटम का रेलम पेला है।

टी वी, रडियो, केबुल पर-

आइटम सोन्ग, आइटम डान्स, व-

आइटम कन्याओं का ठेलम ठेला है।


यहां हर गली में ’गुरू’ हैं

हर कोई किसी न किसी का

चमचा या चेला है ।


भूखा वही मरता है,

जो हठेला है,

शान्त स्वाधीन अकेला है,

जुबान का करेला है,

जिसका न कोई गुरू-

न चमचा न चेला है ॥


नई सदी में नारी–डा श्याम गुप्त.

Posted in literature, saahity -english and hindi on मार्च 9, 2010 by drsbg

पश्चिमी जगत के पुरुष विरोधी रूप से उभरा नारी मुक्ति संघर्ष आज व्यापक मूल्यों के पक्षधर के रूप में अग्रसर हो रहा है । यह मानव समाज के उज्जवल भविष्य का संकेत है। बीसवीं सदी का प्रथमार्ध यदि नारी जागृति का काल था तो उत्तरार्ध नारी प्रगति का । इक्कीसवी सदी क़ा यह महत्वपूर्ण पूर्वार्ध नारी सशक्तीकरण क़ा काल है। आज सिर्फ पश्चिम में ही नहीं वरन विश्व के पिछड़े देशों में भी नारी घर से बाहर खुली हवा में सांस लेरही है , एवं जीवन के हर क्षेत्र में पुरुषों से भी दो कदम आगे बढ़ा चुकी है। अब वह शीघ्र ही अतीत के उस गौरवशाली पद पर पहुँच कर ही दम लेगी जहां नारी के मनुष्य में देवत्व व धरती पर स्वर्ग की सृजिका तथा सांस्कृतिक चेतना की संबाहिका होने के कारण समाज ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता ‘ क़ा मूल मन्त्र गुनुगुनाने को बाध्य हुआ था ।
नारी की आत्म विस्मृति , दैन्यता व पराधीनता के कारणों में विभिन्न सामाजिक मान्यताएं व विशिष्ट परिस्थितियाँ रहीं हैं , जो देश ,काल व समाज के अनुसार भिन्न भिन्न हैं। पश्चिम के दर्शन व संस्कृति में नारी सदैव पुरुषों से हीन , शैतान की कृति,पृथ्वी पर प्रथम अपराधी थी। वह पुरोहित नहीं हो सकती थी । यहाँ तक कि वह मानवी भी है या नहीं ,यह भी विवाद क़ा विषय था। इसीलिये पश्चिम की नारी आत्म धिक्कार के रूप में एवं बदले की भावना से कभी फैशन के नाम पर निर्वस्त्र होती है तो कभी पुरुष की बराबरी के नाम पर अविवेकशील व अमर्यादित व्यवहार करती है।
पश्चिम के विपरीत भारतीय संस्कृति व दर्शन में नारी क़ा सदैव गौरवपूर्ण व पुरुष से श्रेष्ठतर स्थान रहा है। ‘अर्धनारीश्वर ‘ की कल्पना अन्यंत्र कहाँ है। भारतीय दर्शन में सृष्टि क़ा मूल कारण , अखंड मातृसत्ता – अदिति भी नारी है। वेद माता गायत्री है। प्राचीन काल में स्त्री ऋषिका भी थी , पुरोहित भी। व गृह स्वामिनी , अर्धांगिनी ,श्री ,समृद्धि आदि रूपों से सुशोभित थी। कोइ भी पूजा, यग्य, अनुष्ठान उसके बिना पूरा नहीं होता था। ऋग्वेद की ऋषिका -शची पोलोमी कहती है–
“” अहं केतुरहं मूर्धाहमुग्रा विवाचानी । ममेदनु क्रतुपति: सेहनाया उपाचरेत ॥ “”—ऋग्वेद -१०/१५९/२
अर्थात -मैं ध्वजारूप (गृह स्वामिनी ),तीब्र बुद्धि वाली एवं प्रत्येक विषय पर परामर्श देने में समर्थ हूँ । मेरे कार्यों क़ा मेरे पतिदेव सदा समर्थन करते हैं । हाँ , मध्ययुगीन अन्धकार के काल में बर्बर व असभ्य विदेशी आक्रान्ताओं की लम्बी पराधीनता से उत्पन्न विषम सामाजिक स्थिति के घुटन भरे माहौल के कारण भारतीय नारी की चेतना भी अज्ञानता के अन्धकार में खोगई थी।
नई सदी में नारी को समाज की नियंता बनने के लिए किसी से अधिकार माँगने की आवश्यकता नहीं है,वरन उसे अर्जित करने की है। आरक्षण की वैशाखियों पर अधिक दूर तक कौन जासका है । परिश्रम से अर्जित अधिकार ही स्थायी संपत्ति हो सकते हैं। परन्तु पुरुषों की बराबरी के नाम पर स्त्रियोचित गुणों व कर्तव्यों क़ा बलिदान नहीं किया जाना चाहिए। ममता , वात्सल्य, उदारता, धैर्य,लज्जा आदि नारी सुलभ गुणों के कारण ही नारी पुरुष से श्रेष्ठ है। जहां ‘ कामायनी ‘ क़ा रचनाकार ” नारी तुम केवल श्रृद्धा हो” से नतमस्तक होता है, वहीं वैदिक ऋषि घोषणा करता है कि-“….स्त्री हि ब्रह्मा विभूविथ :” उचित आचरण, ज्ञान से नारी तुम निश्चय ही ब्रह्मा की पदवी पाने योग्य हो सकती हो। ( ऋ.८/३३/१६ )।
नारी मुक्ति व सशक्तीकरण क़ा यह मार्ग भटकाव व मृगमरीचिका से भी मुक्त नहीं है। नारी -विवेक की सीमाएं तोड़ने पर सारा मानव समाज खतरे में पड़ सक़ता है। भौतिकता प्रधान युग में सौन्दर्य की परिभाषा सिर्फ शरीर तक ही सिमट जाती है। नारी मुक्ति के नाम पर उसकी जड़ों में कुठाराघात करने की भूमिका में मुक्त बाज़ार व्यवस्था व पुरुषों के अपने स्वार्थ हैं । परन्तु नारी की समझौते वाली भूमिका के बिना यह संभव नहीं है। अपने को ‘बोल्ड’ एवं आधुनिक सिद्ध करने की होड़ में, अधिकाधिक उत्तेज़क रूप में प्रस्तुत करने की धारणा न तो शास्त्रीय ही है और न भारतीय । आज नारी गरिमा के इस घातक प्रचलन क़ा प्रभाव तथाकथित प्रगतिशील समाज में तो है ही, ग्रामीण समाज व कस्बे भी इसी हवा में हिलते नज़र आ रहे हैं। नई पीढी दिग्भ्रमित व असुरक्षित है। युवतियों के आदर्श वालीवुड व हालीवुड की अभिनेत्रियाँ हैं। सीता, मदालसा, अपाला,लक्ष्मी बाई ,ज़ोन ऑफ़ आर्क के आदर्श व उनको जानना पिछड़ेपन की निशानी है।
इस स्थिति से उबरने क़ा एकमात्र उपाय यही है कि नारी अन्धानुकरण त्याग कर ,भोगवादी संस्कृति से अपने को मुक्त करे। अपनी लाखों , करोड़ों पिछड़ी अनपढ़ बेसहारा बहनों के दुखादर्दों को बांटकर उन्हें शैक्षिक , सामाजिक, व आर्थिक स्वाबलंबन क़ा मार्ग दिखाकर सभी को अपने साथ प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होना सिखाये । तभी सही अर्थों में सशक्त होकर नारी इक्कीसवीं सदी की समाज की नियंता हो सकेगी ।

डा श्याम गुप्त की गज़ल–

Posted in literature on जनवरी 16, 2010 by drsbg

गज़ल

आंखों की राह आये वो दिल में समा गये ।

कैसे बताएं कब मिले कब दिल में आ गये ।


हम चाहते ही रह गये चाहें नही उन्हें,

वो हाथ लेकर ्हाथ में कस्में दिला गये ।


अब क्या कहें क्या ना कहें मज़्बूर यूं हुए,

सब कुछ तो उनसे कह गये बातों में आगये।


कातिल थी वो निगाह और शातिर थे निशाने,

घायल किया बेसुध किया ख्वाबों में छा गये ।


इतनी सी है बस आरज़ू अब हमारी श्याम,

सच कहिये हम भी आपकी चाहों में आगये ॥


.डा श्याम गुप्त की कविता –सृष्टि को आगे बढाने का क्रम—?.

Posted in literature on दिसम्बर 9, 2009 by drsbg

.—- पिता-पुत्र का दायित्व — यह सच है कि ,ईश्वर ने- सृष्टि को आगे बढाने का बोझ , नारी पर डाल दिया, पर- पुरुष पर भी तो….. | अंततः कब तक एक पिता ,बच्चों को- उंगली पकड़ कर चलाता रहेगा | बच्चा स्वयं अपना दायित्व निभाये, उचित,शाश्वत,मानवीय मार्ग पर चले, चलाये; अपने पिता के सच्चे पुत्र होने का , दायित्व निभाये | आत्मा से परमात्मा बनने का, अणु से विभु होने का हौसला दिखाए; मानव से ईश्वर तक की यात्रा पूर्ण करने का, जीवन लक्ष्य पूर्ण कर पाए , मुक्ति राह पाजाये | पर नर-नारी दोनों ने ही , अपने-अपने दायित्व नहीं निभाये ; फैशन, वस्त्र उतारने की होड़ , पुरुष बनने की इच्छा रूपी नारी दंभ , गर्भपात, वधु उत्प्रीणन ,कन्या अशिक्षा, दहेज़ ह्त्या,बलात्कार,नारी शोषण से- मानव ने किया है कलंकित – अपने पिता को,ईश्वर को , और– करके व्याख्यायित आधुनिक विज्ञान, कहता है अपने को सर्व शक्तिमान , करता है ईश्वर को बदनाम ||

A Poem by-Dr shyam gupta –Hindi- sakhi kaise !!

Posted in literature on नवम्बर 4, 2009 by drsbg

– डा श्याम गुप्त की कविता …..

कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित——-
सखि कैसे !

सखि री तेरी कटि छीन ,पयोधर भार भला धरती हो कैसे ?
बोली सखी मुसुकाइ, हिये, उर भार तिहारो धरतीं हैं जैसे |

भोंहें बनाई कमान भला , हैं तीर कहाँ पै ,निशाना हो कैसे ?
नैनन  के  तूरीण में बाण ,  धरे उर ,पैनी कटार   के जैसे   |

कौन यहाँ मृग-बाघ धरे , कहो बाणन वार शिकार हो कैसे ?
तुम्हरो हियो मृग भांति  पिया,जब मारै कुलांच,शिकार हो जैसे |

प्रीति तेरी  मनमीत प्रिया ,उलझाए ये मन उलझी लट,जैसे |
लट सुलझाय तौ तुम ही गए,प्रिय मन उलझाय गए कहो कैसे ?

ओठ तेरे विम्बा फल भांति, किये रचि लाल , अंगार के जैसे |
नैन तेरे प्रिय प्रेमी चकोर ,रखें मन जोरि अंगार से जैसे |

अनहद नाद को गीत बजै,संगीत प्रिया अंगडाई लिए  से   |
कंचन काया के ताल-मृदंग पै, थाप तिहारी कलाई दिए ते |

प्रीति भरे रस-बैन तेरे,कहो कोकिल कंठ भरे रस कैसे ?
प्रीति की बंसी तेरे उर की ,पिय देती सुनाई मेरे उर में से |

पंकज नाल सी बाहें प्रिया ,उर बीच धरे  क्यों, अँखियाँ मीचे ?
मत्त-मतंग  की नाल सी बाहें ,भरें उर बीच रखें मन सींचे ||

 

ageet vidhaa and its various ‘Chhands’

Posted in literature on अक्टूबर 27, 2009 by drsbg

कविता,पूर्व-वेदिक्युग,वैदिक युग,पश्च-वेदिक व पौराणिक काल में वस्तुतः मुक्त-छन्द ही थी।वह ब्रह्म की भांति स्वच्छंद व बन्धन मुक्त ही थी।आन्चलिक गीतों,रिचाओं ,छन्दों,श्लोकों व विश्व भर की भाषाओंमें अतुकान्त छन्द काव्य आज भी विद्यमान है।कालान्तर में मानव-सुविधा  स्वभाव वश,चित्र प्रियता वश,ग्यानान्डंबर,सुखानुभूति-प्

रीति हित;सन्स्थाओं,दरवारों,मन्दिरों,बन्द कमरों में काव्य-प्रयोजन हेतु,कविता छन्द-शास्त्र व अलन्करणों के बन्धन में बंधती गई तथा उसका वही रूप प्रचलित व सार्वभौम होता गया। इस प्रकार वन-उपवन में स्वच्छंद विहार करने वाली कविता-कोकिला,वाटिकाओं,गमलों,क्यारियों में सजे पुष्पों पर मंडराने वाले भ्रमर व तितली होकर रह गयी।वह प्रतिभा प्रदर्शन व गुरु गौरव के बोध से,नियन्त्रण व अनुशासन से बोझिल होती गयी, और स्वाभाविक ,ह्रदय स्पर्शी,स्वभूत,निरपेक्ष कविता; विद्वतापूर्ण व सापेक्ष काव्य में परिवर्तित होती गयी, साथ ही देश,समाज़,राष्ट्र, जाति भी बन्धनों में बंधते गये। स्वतन्त्रता पूर्व की कविता यद्यपि सार्व भौम प्रभाव वश छन्दमय ही है तथापि उसमें देश ,समाज़, राष्ट्र को बन्धन मुक्ति की छटपटाहत व आत्मा को स्वच्छंद करने की,जन-जन प्रवेश की इच्छा है। निराला जी से पहले भी आल्हखंड के जगनिक,टैगोर की बांगला कविता, प्रसाद,मैथिली शरण गुप्त,हरिओध,पन्त आदि कवि सान्त्योनुप्रास-सममात्रिक कविता के साथ-साथ; विषम-मात्रिक-अतुकान्त काव्य की भी रचना कर रहे थे,परन्तु वो पूर्ण रूप से प्रचलित छन्द विधान से मुक्त,मुक्त-छन्द कविता नहीं थी।यथा—

“दिवस का अवसान समीप था,
गगन भी था कुछ लोहित हो चला;
तरु-शिखा पर थी अब राजती,
कमलिनी कुल-वल्लभ की विभा।”—–अयोध्या सिन्ह उपाध्याय “हरिओध’

“तो फ़ि क्या हुआ,
सिद्ध राज जयसिंह;
मर गया हाय,
तुम पापी प्रेत उसके।”——मैथिली शरण गुप्त

“विरह,अहह,कराहते इस शब्द को,
निठुर विधि ने आंसुओं से है लिखा।”—–सुमित्रा नन्दन पन्त

इस काल में भी गुरुडम,प्रतिभा प्रदर्शन मे संलग्न अधिकतर साहित्यकारों,कवियों,राजनैतिग्यों का ध्यान राष्ट्र-भाषा के विकास पर नहीं था। निराला ने सर्वप्रथम बाबू भारतेन्दु व महाबीर प्रसाद द्विवेदी जी को यह श्रेय दिया। निराला जी वस्तुत काव्य को वैदिक साहित्य के अनुशीलन में,बन्धन मुक्त करना चाहते थे ताकि कविता के साथ-साथ ही व्यक्ति ,समाज़,देश,राष्ट्र की मुक्ति का मार्ग भी प्रशस्त हो सके।”परिमल” में वे तीन खंडों में तीन प्रकार की रचनायें प्रस्तुत करते हैं। अन्तिम खंड की रचनायें पूर्णतः मुक्त-छंद कविताएं हैं। हिन्दी के उत्थान,सशक्त बान्गला से टक्कर,प्रगति की उत्कट ललक व खडी बोली को सिर्फ़ ’ आगरा ’ के आस-पास की भाषा समझने वालों को गलत ठहरानेऔर खडी बोली की,जो शुद्ध हिन्दी थी व राष्ट्र भाषा होने के सर्वथा योग्य,उपयुक्त व हकदार थी, सर्वतोमुखी प्रगति व बिकास की ललक मेंनिराला जी कविता को स्वच्छंन्द व मुक्त छंद करने को कटिबद्ध थे। इस प्रकार मुक्त-छंद,अतुकान्त काव्य व स्वच्छद कविता की स्थापना हुई।
परंतु निराला युग या स्वय निराला जी की अतुकान्त कविता, मुख्यतयाः छायावादी,यथार्थ वर्णन,प्राचीनता की पुनराव्रत्ति, सामाजिक सरोकारों का वर्णन, स्समयिक वर्णन,राष्ट्र्वाद तक सीमित थी। क्योंकि उनका मुख्य उद्धेश्य कविता को मुक्त छन्द मय करना व हिन्दी का उत्थान,प्रतिष्ठापन था। वे कवितायें लम्बी-लम्बी,वर्णानात्मक थीं, उनमें वस्तुतः आगे के युग की आधुनिक युगानुरूप आवश्यकता-सन्क्षिप्तता के साथ तीव्र भाव सम्प्रेषणता, सरलता,सुरुचिकरता के साथ-साथ,सामाजिक सरोकारों के समुचित समाधान की प्रस्तुति का अभाव था। यथा—कवितायें,  “अबे सुन बे गुलाब…..”;”वह तोडती पत्थर…..” ; “वह आता पछताता ….”  उत्क्रष्टता ,यथार्थता,काव्य-सौन्दर्य के साथ समाधान का प्रदर्शन नहीं है। उस काल की मुख्य-धारा की नयी-नयी धाराओं-अकविता,यथार्थ-कविता,प्रगतिवादी कविता-में भी समाधान प्रदर्शन का यही अभाव है।यथा–
“तीन टांगों पर खडा,
नत ग्रीव,
धैर्य-धन गदहा”   अथवा–
“वह कुम्हार का लडका,
और एक लडकी,
भेंस की पीठ पर कोहनी टिकाये,
देखते ही देखते चिकोटी काटी
और…….”

इनमें आक्रोश,विचित्र मयता,चौकाने वाले भाव तो है, अंग्रेज़ी व योरोपीय काव्य के अनुशीलन में; परन्तुविशुद्ध भारतीय चिन्तन व मंथन से आलोडित व समाधान युक्त भाव नहीं हैं। इन्हीं सामयिक व युगानुकूल आवश्यकताओं के अभाव की पूर्ति व हिन्दी भाषा ,साहित्य,छंद-शास्त्र व समाज के और अग्रगामी,उत्तरोत्तर व समग्र विकास की प्राप्ति हेतु नवीन धारा  “अगीत” का आविर्भाव हुआ,जो निराला-युग के काव्य-मुक्ति आन्दोलन को आगे बडाते हुए भी उनके मुक्त-छंद काव्य से प्रथक अगले सोपान की धारा है। यह धारा, सन्क्षिप्तता,सरलता, तीव्र-भाव सम्प्रेषणता व सामाजिक सरोकारों के उचित समाधान से युक्त युगानुरूप कविता की कमी को पूरा करती है। उदाहरणार्थ—-

“कवि चिथडे पहने,
चखता सन्केतों का रस,
रचता-रस,छंद, अलंकार,
ऐसे कवि के,
क्या कहने।”—————डा रंगनाथ मिश्र ’सत्य’

“अग्यान तमिस्रा को मिटाकर,
आर्थिक रूप से सम्रद्ध होगी,
प्रबुद्ध होगी,
नारी! ,तू तभी स्वतन्त्र होगी।”—— श्रीमती सुषमा गुप्ता

“सन्कल्प ले चुके हम,
पोलिओ-मुक्त जीवन का,
धर्म और आतन्क के –
विष से मुक्ति का,
संकल्प भी तो लें हम।”—–महा कवि श्री जगत नारायण पान्डेय

” सावन सूखा बीत गया तो,
दोष बहारों को मत देना;
तुमने सागर किया प्रदूषित”—–डा. श्याम गुप्त

इस धारा “अगीत” का प्रवर्तन सन १९६६ ई. में काव्य की सभी धाराओं मे निष्णात, कर्मठ व उत्साही वरिष्ठ कवि आ. रंग नाथ मिश्र’सत्य’ ने लखनऊ से किया।तब से यह विधा, अगणित कवियों, साहित्यकारों द्वाराविभिन्न रचनाओं,काव्य-सन्ग्रहों, अगीत -खन्ड-काव्यों व महा काव्योंआदि से सम्रद्धि के शिखर पर्ब चढती जारही है।
इस प्रकार निश्चय ही अगीत, अगीत के प्रवर्तक डा. सत्य व अगणित रचनाकार ,समीक्षक व रचनायें, निराला-युग से आगे, हिन्दी, हिन्दी सा्हित्य,व छन्द शास्त्र के विकास की अग्रगामी ध्वज व पताकायें हैं, जिसे अन्य धारायें, यहां तक कि मुख्य धारा गीति-छन्द विधा भी नहें उठापाई; अगीत ने यह कर दिखाया है,और इसके लिये क्रत-संकल्प है।

———डा. श्याम गुप्त
के-३४८, आशियाना, लखनऊ-२२६०१२.
मो. ०९४१५१५६४६४.

aashiqee

Posted in literature on अक्टूबर 26, 2009 by drsbg

नज़्म–अंदाज़ आशिकी का

ये हुश्न चांदनी का, मौसम है आशिकी का  |
ये तो समा है दिलवर,  इज़हारे आशिकी का |
ये चाँद ये सितारे ,ये इश्क के इशारे,
खामोश ये नजारे,ये दिल तुझे पुकारे |
हर ज़र्रा कर रहा है,  इज़हार  जिन्दगी का ,
ये तो सामान है दिलवर , इज़हारे आशिकी का |
दिल में भी तुम बसे हो,ख्यालों में हो समाये |
यादों में जब पुकारा,तुम ख्वाव बनके आये |
अब आ भी जाओ ,करलो आगाज़ जिन्दगी का  |
यह तो अभी है दिलवर,    इज़हार बंदगी का   |
कुछ तो सुनो हमारे,इकरार का फ़साना |
आजाओ देखने को ,बेताब है ज़माना  |
रहता नहीं  सदा यह,      अंदाज़ आशिकी का |
ये तो सामान है दिलवर , इज़हारे आशिकी का||

—– डा श्याम गुप्ता , के-३४८, आशियाना ,लखनऊ २२६०१२.