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upahaar

Posted in 1 on फ़रवरी 14, 2010 by drsbg


कवि का वेलेंटाइन-उपहार

प्रिय तुमको दूं क्या उपहार |
मैं तो कवि हूँ मुझ पर क्या है ,
कविता गीतों की झंकार |
प्रिय तुमको दूं क्या उपहार |

गीत रचूँ तो तुम ये समझना,
पायल कंगना चूड़ी खन खन |
छंद कहूं तो यही समझना ,
कर्ण फूल बिछुओं की रुन झुन |

मुक्तक रूपी बिंदिया लाऊँ ,
या नगमों से होठ रचाऊँ |
ग़ज़ल कहूं तो उर में हे प्रिय !
पहनाया हीरों का हार ||—प्रिय तुमको….

दोहा,  बरवै,  छंद,  सवैया ,
अलंकार रस छंद – विधान |
लाया   तेरे  अंग- अंग को,
विविधि रूप के प्रिय परिधान |

भाव ताल लय भाषा वाणी ,
अभिधा लक्षणा और व्यंजना |
तेरे प्रीति- गान कल्याणी,
तेरे रूप की प्रीति वन्दना  |

नव- गीतों की बने अंगूठी ,
नव-अगीत की मेहंदी भाये |
जो घनाक्षरी सुनो तो समझो,
नक् -बेसर छलकाए प्यार |…–प्रिय तुमको….||

नज्मों की करधनी मंगालो,
साड़ी छप्पय कुंडलियों की |
चौपाई की मुक्ता-मणि से,
प्रिय तुम अपनी मांग सजालो |

शेर,  समीक्षा, मस्तक- टीका,
बाजू बंद तुकांत छंद हों |
कज़रा अलता कथा कहानी,
पद, पदफूल व हाथफूल हों |

उपन्यास केशों की वेणी,
और अगीत फूलों का हार |
मंगल सूत्र सी वाणी- वन्दना ,
काव्य-शास्त्र दूं तुझपे वार |—-प्रिय तुमको ….||

——डा श्याम गुप्त

नश्वर जीवन —-

Posted in 1 on अक्टूबर 30, 2009 by drsbg

नश्वर जीवन का अभिनन्दन,
अटल मृत्यु पर करुणा  क्रंदन |
कर्म लीन नर भला करे क्यों,
अमर आत्मा भला डरे क्यों |

जीवन भी वह ही देता है,
जीवन भी वह ही लेता है |
देने वाला लेलेता है,
अमर अनश्वर भला डरे क्यों |

ना जीवन का अभिनन्दन हो,
ना ही क्रंदन करें मृत्यु  का |
होगा जैसा काल गति करे,
चलता है निर्देश उसी का |

हम अभिनन्दन करें सत्य का,
सत्य कर्म में बसता है |
जो अभिनन्दन करे कर्म का,
उसमें ईश्वर बसता है |

सत्य मौन से भी विशिष्ट है,
सत्य जान क्यों मौन रहे  ?
जो न कह सके सत्य उठा सर,
उसको मानव कौन कहे  ?

चाहे जितना पथिक थको तुम,
बार-बार फिर यत्न करो  |
विजय श्री की चाहत है तो,
पुनः कर्म आरम्भ करो |

अपना-अपना कार्य लगन से,
जो    नर  करते रहते हैं  |
दूर रहें या पास रहें वो,
लोगों में प्रिय रहते हैं |

सुख-दुःख की यह इच्छा ही तो ,
जीवन, बैभव, मुक्ति बने |
दुःख आया सुख भी आयेगा,
परम आत्मा भला डरे क्यों ||

 

Posted in 1 on अक्टूबर 27, 2009 by drsbg
गीत व कविता वस्तुतः मन की गहराई से निस्रत होते हैं , जीवन एक गीत ही है , जीवन व आयु के विभिन्न सोपानों परउठते हुए विभिन्न भावों को सहेज़ते हुएमन के भाव- गीतों के विभिन्न रूप भाव निसृत होते हैं उसी के भावानुसार ही गीतनिसृत होते हैं, इन गीत भावों को प्रत्येक मन , मानव ,व्यक्तित्व अपने जीवन में अनुभव करता है, जीता है , बस कवि उन्हेंमानस की मसि में डुबो कर कागज़ पर उतार देता है ; देखिये कैसे –)
गीत बन गए

दर्द बहुत थे ,भुला दिए सब ,
भूल न पाये ,वे बह निकले –
कविता बनकर ,प्रीति बन गए |
दर्द जो गहरे ,नहीं बह सके ;
उठे भाव बन ,गहराई से,
वे दिल की अनुभूति बन गए |

 

दर्द मेरे मन मीत बन गए ,
यूँ मेरे नव-गीत बन गए ||

भावुक मन की विविधाओं से,
बन सुगंध वे छंद बने फ़िर-
सुर लय बन कर गीत बन गए |
भूली-बिसरी यादों के उन,
मंद समीरण की थपकी से
ताल बने संगीत बन गए |—दर्द मेरे….||

सुख के पल छिन जो भी आए,
स्वप्न सुहाने से मन भाये;
प्रणय मिलन के मधुरिम पल में,
तन-मन के मधु-सुख कम्पन बन ;
तनकी भव-सुख प्रीति बन गए,
गति यति बन रस रीति बन गए |—दर्द मेरे ….||

ज्ञान-कर्म के ,नीति-धर्म के,
विविध रूप जब मन में उभरे |
सत् के पथ की राह चले तो ,
जग-जीवन की नीति बन गए |
तन के मन के अलंकार बन,
जीवन की भव -भूति बन गए|—–यूँ मेरे नव …..||

दर्शन भक्ति विराग-त्याग के,
सुख संतोष भाव मन छाये ;
प्रभु की प्रीति के भाव बने तो ,
आनंद सुख अनुभूति बन गए |
आत्मलीन जब मुग्ध मन हुए;
परमानंद विभूति बन गए |—–दर्द मेरे……..||

अप्रमेय अनुपम अविनाशी ,
अगुन अभाव नित विश्व प्रकाशी ;
सत् चित आनंद घट घट बासी ,
अंतस के जब मीत बन गए ;
अमृत घट के दीप जल गए ,
आदि अनाहत गीत बन गए |

दर्द मेरे मन मीत बन गए,
यूँ मेरे नव-गीत बन गए ||

 





the immortal love —moon & chakor

Posted in 1 on जून 20, 2009 by drsbg

o chakor!

why you keep on looking ,

lovingly,towards MOON ?

It ‘s far away, not approachable;

Why you keep on entangled

The bondage of your heart,still.

The depth of love is immeasureable,

The chakor thus uttered the syllable;-

The hope of  ,

acceptance of love by loved ones

Make the heart sing & dance.

It does’nt mean if

They are near to each other

Or far away.

The lovers talks in various way.

In eyes to eyes

In hearts to hearts

Through clauds or rain or a dove,

And that is what it’s called the love.

Love is not only to get,

Those who don’t get, really get,

To each other one may forget;

To  immortal love  one  never forget.

speculation in vain.

Posted in 1 on मई 9, 2009 by drsbg

Have you ever seen and thought about speculations all in vain? See cricket -game on t.v..in programms-extra innings or commetary on field etc etc ,,doing ,telling ,explalaining various speculations all in vain. Fingering the grass and clay on pitch and making so many speculations to be prooved wrong and again open for various new speculations. Any one -the player,pitch maaster,captain,old players,commentators,specialists(so called),can say anything relevant or irrelevant,whatever he likes or immediatly comes to his mind. But all to be prooved in vain. 

      but one thing is that is not in vain , that the aim  bread & butterof the ex,retd.,not fruiteful ,useless players etc is beeing fulfilled, on the cost of viewers.

the positive thinking!, ney Gunaatmak (multiplitive) thinking to be.

Posted in 1 on मई 1, 2009 by drsbg

now a days people usually talk in terms of –positive thinking, positive thoughts etc. and the negative thinking ,negative thoughts etc.  In fact these words have less effective caricature and approach to the subject . THe words used in Indian society ,in hindi usage is–asaty( wrong or untrue) instead of negative and Gunaatmak (multiplitive, dependent on value & good actions, true  fruitful activities) instead of positive. These words have more power,effect and are judiciously analysed one. People (good &right one and bad &wrong one ) can not shake hands taking the subjects of ones own thinking.

just thinking

Posted in 1 on अप्रैल 27, 2009 by drsbg

people usually talk about -positive thinking-negative thinking. in my vieu it must be the just thinking -ie right thing to think. foe example–a common given examp.–the container with water–is half full ,is positive thinking & half empty, is negative one.

      now the just thinking should be -why the container ia half ful,either the person is only that much thirsty & and does not want to care further,or he is gumbling for more ; or whythe the container is half empty-either there is shortage of water and the person is saving water by not to take full container and through the rest.

        so if to think just  lets the person reasonably,think , and to act justifiably, and justify his act.