कुछ कतए …डा श्याम गुप्त

कतए

 

न बहर से न वज्न से ग़ज़ल गुलज़ार होती है |
कहने का अंदाज़ जुदा हो, बहरे बहार होती है |
गज़ल तो इक अंदाज़े बयाँ है दोस्त,
श्याम तो जो कहदें, गज़ले-बहार होती है |

मर मर के कभी प्यार निभाया नहीं जाता
पहले यकीं, फिर प्यार, जताया नहीं जाता |
ख़ुश-ख़ुश न निभाया जो प्यार ही क्या है –
शर्तों से प्यार को यूं सताया नहीं जाता |

 

एक ही शेर में कहन पूरी नहीं कर पाता है |
शायर कहन को दो शेरो में सजाता है |
दो शेरों की इक मुक्त-ग़ज़ल होती है –
शायरों द्वारा श्याम’ कतआ कहा जाता है |

 

किसके गेसुओं की घनी छाँव थी जो,
आह को भी ठंडा करने की एक राह थी जो |
इक याद है, ह्रदय का कोमल भाव है वो ,
कैसे कहें श्याम’ कौन है, इक चाह है वो ||
अब तो औरत है आज़ाद कहाँ बंधन हैं,
स्वच्छंद घूमे पहन निक्कर कहाँ बंधन है |
हुए दिन वो हवा अग्नि-परीक्षा के यारो-
कहाँ जारहे हैं हम करें बैठ के कुछ मंथन है |

 

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One Response to “कुछ कतए …डा श्याम गुप्त”

  1. I an Dr S.B. Gupta, A surgeon , MBBS, MS from AGRA, INDIA, worked in Indian Railwas in differant parts of country. Basically belong to AGRA, the city of TAJ, now setteled in Lucknow, U.P. India. I am A vivid writer on Hindi literature and has written nine books so far; still working on the subject.
    My other blogs are–The world of my thoughts..shyam smriti, & saahity shyam, vijaanaati-vijaanaati-vigyaan, ageetayan…..

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