जनवरी, 2010 के लिए पुरालेख

डा श्याम गुप्त की गज़ल–

Posted in literature on जनवरी 16, 2010 by drsbg

गज़ल

आंखों की राह आये वो दिल में समा गये ।

कैसे बताएं कब मिले कब दिल में आ गये ।


हम चाहते ही रह गये चाहें नही उन्हें,

वो हाथ लेकर ्हाथ में कस्में दिला गये ।


अब क्या कहें क्या ना कहें मज़्बूर यूं हुए,

सब कुछ तो उनसे कह गये बातों में आगये।


कातिल थी वो निगाह और शातिर थे निशाने,

घायल किया बेसुध किया ख्वाबों में छा गये ।


इतनी सी है बस आरज़ू अब हमारी श्याम,

सच कहिये हम भी आपकी चाहों में आगये ॥


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