ageet vidhaa and its various ‘Chhands’

कविता,पूर्व-वेदिक्युग,वैदिक युग,पश्च-वेदिक व पौराणिक काल में वस्तुतः मुक्त-छन्द ही थी।वह ब्रह्म की भांति स्वच्छंद व बन्धन मुक्त ही थी।आन्चलिक गीतों,रिचाओं ,छन्दों,श्लोकों व विश्व भर की भाषाओंमें अतुकान्त छन्द काव्य आज भी विद्यमान है।कालान्तर में मानव-सुविधा  स्वभाव वश,चित्र प्रियता वश,ग्यानान्डंबर,सुखानुभूति-प्

रीति हित;सन्स्थाओं,दरवारों,मन्दिरों,बन्द कमरों में काव्य-प्रयोजन हेतु,कविता छन्द-शास्त्र व अलन्करणों के बन्धन में बंधती गई तथा उसका वही रूप प्रचलित व सार्वभौम होता गया। इस प्रकार वन-उपवन में स्वच्छंद विहार करने वाली कविता-कोकिला,वाटिकाओं,गमलों,क्यारियों में सजे पुष्पों पर मंडराने वाले भ्रमर व तितली होकर रह गयी।वह प्रतिभा प्रदर्शन व गुरु गौरव के बोध से,नियन्त्रण व अनुशासन से बोझिल होती गयी, और स्वाभाविक ,ह्रदय स्पर्शी,स्वभूत,निरपेक्ष कविता; विद्वतापूर्ण व सापेक्ष काव्य में परिवर्तित होती गयी, साथ ही देश,समाज़,राष्ट्र, जाति भी बन्धनों में बंधते गये। स्वतन्त्रता पूर्व की कविता यद्यपि सार्व भौम प्रभाव वश छन्दमय ही है तथापि उसमें देश ,समाज़, राष्ट्र को बन्धन मुक्ति की छटपटाहत व आत्मा को स्वच्छंद करने की,जन-जन प्रवेश की इच्छा है। निराला जी से पहले भी आल्हखंड के जगनिक,टैगोर की बांगला कविता, प्रसाद,मैथिली शरण गुप्त,हरिओध,पन्त आदि कवि सान्त्योनुप्रास-सममात्रिक कविता के साथ-साथ; विषम-मात्रिक-अतुकान्त काव्य की भी रचना कर रहे थे,परन्तु वो पूर्ण रूप से प्रचलित छन्द विधान से मुक्त,मुक्त-छन्द कविता नहीं थी।यथा—

“दिवस का अवसान समीप था,
गगन भी था कुछ लोहित हो चला;
तरु-शिखा पर थी अब राजती,
कमलिनी कुल-वल्लभ की विभा।”—–अयोध्या सिन्ह उपाध्याय “हरिओध’

“तो फ़ि क्या हुआ,
सिद्ध राज जयसिंह;
मर गया हाय,
तुम पापी प्रेत उसके।”——मैथिली शरण गुप्त

“विरह,अहह,कराहते इस शब्द को,
निठुर विधि ने आंसुओं से है लिखा।”—–सुमित्रा नन्दन पन्त

इस काल में भी गुरुडम,प्रतिभा प्रदर्शन मे संलग्न अधिकतर साहित्यकारों,कवियों,राजनैतिग्यों का ध्यान राष्ट्र-भाषा के विकास पर नहीं था। निराला ने सर्वप्रथम बाबू भारतेन्दु व महाबीर प्रसाद द्विवेदी जी को यह श्रेय दिया। निराला जी वस्तुत काव्य को वैदिक साहित्य के अनुशीलन में,बन्धन मुक्त करना चाहते थे ताकि कविता के साथ-साथ ही व्यक्ति ,समाज़,देश,राष्ट्र की मुक्ति का मार्ग भी प्रशस्त हो सके।”परिमल” में वे तीन खंडों में तीन प्रकार की रचनायें प्रस्तुत करते हैं। अन्तिम खंड की रचनायें पूर्णतः मुक्त-छंद कविताएं हैं। हिन्दी के उत्थान,सशक्त बान्गला से टक्कर,प्रगति की उत्कट ललक व खडी बोली को सिर्फ़ ’ आगरा ’ के आस-पास की भाषा समझने वालों को गलत ठहरानेऔर खडी बोली की,जो शुद्ध हिन्दी थी व राष्ट्र भाषा होने के सर्वथा योग्य,उपयुक्त व हकदार थी, सर्वतोमुखी प्रगति व बिकास की ललक मेंनिराला जी कविता को स्वच्छंन्द व मुक्त छंद करने को कटिबद्ध थे। इस प्रकार मुक्त-छंद,अतुकान्त काव्य व स्वच्छद कविता की स्थापना हुई।
परंतु निराला युग या स्वय निराला जी की अतुकान्त कविता, मुख्यतयाः छायावादी,यथार्थ वर्णन,प्राचीनता की पुनराव्रत्ति, सामाजिक सरोकारों का वर्णन, स्समयिक वर्णन,राष्ट्र्वाद तक सीमित थी। क्योंकि उनका मुख्य उद्धेश्य कविता को मुक्त छन्द मय करना व हिन्दी का उत्थान,प्रतिष्ठापन था। वे कवितायें लम्बी-लम्बी,वर्णानात्मक थीं, उनमें वस्तुतः आगे के युग की आधुनिक युगानुरूप आवश्यकता-सन्क्षिप्तता के साथ तीव्र भाव सम्प्रेषणता, सरलता,सुरुचिकरता के साथ-साथ,सामाजिक सरोकारों के समुचित समाधान की प्रस्तुति का अभाव था। यथा—कवितायें,  “अबे सुन बे गुलाब…..”;”वह तोडती पत्थर…..” ; “वह आता पछताता ….”  उत्क्रष्टता ,यथार्थता,काव्य-सौन्दर्य के साथ समाधान का प्रदर्शन नहीं है। उस काल की मुख्य-धारा की नयी-नयी धाराओं-अकविता,यथार्थ-कविता,प्रगतिवादी कविता-में भी समाधान प्रदर्शन का यही अभाव है।यथा–
“तीन टांगों पर खडा,
नत ग्रीव,
धैर्य-धन गदहा”   अथवा–
“वह कुम्हार का लडका,
और एक लडकी,
भेंस की पीठ पर कोहनी टिकाये,
देखते ही देखते चिकोटी काटी
और…….”

इनमें आक्रोश,विचित्र मयता,चौकाने वाले भाव तो है, अंग्रेज़ी व योरोपीय काव्य के अनुशीलन में; परन्तुविशुद्ध भारतीय चिन्तन व मंथन से आलोडित व समाधान युक्त भाव नहीं हैं। इन्हीं सामयिक व युगानुकूल आवश्यकताओं के अभाव की पूर्ति व हिन्दी भाषा ,साहित्य,छंद-शास्त्र व समाज के और अग्रगामी,उत्तरोत्तर व समग्र विकास की प्राप्ति हेतु नवीन धारा  “अगीत” का आविर्भाव हुआ,जो निराला-युग के काव्य-मुक्ति आन्दोलन को आगे बडाते हुए भी उनके मुक्त-छंद काव्य से प्रथक अगले सोपान की धारा है। यह धारा, सन्क्षिप्तता,सरलता, तीव्र-भाव सम्प्रेषणता व सामाजिक सरोकारों के उचित समाधान से युक्त युगानुरूप कविता की कमी को पूरा करती है। उदाहरणार्थ—-

“कवि चिथडे पहने,
चखता सन्केतों का रस,
रचता-रस,छंद, अलंकार,
ऐसे कवि के,
क्या कहने।”—————डा रंगनाथ मिश्र ’सत्य’

“अग्यान तमिस्रा को मिटाकर,
आर्थिक रूप से सम्रद्ध होगी,
प्रबुद्ध होगी,
नारी! ,तू तभी स्वतन्त्र होगी।”—— श्रीमती सुषमा गुप्ता

“सन्कल्प ले चुके हम,
पोलिओ-मुक्त जीवन का,
धर्म और आतन्क के –
विष से मुक्ति का,
संकल्प भी तो लें हम।”—–महा कवि श्री जगत नारायण पान्डेय

” सावन सूखा बीत गया तो,
दोष बहारों को मत देना;
तुमने सागर किया प्रदूषित”—–डा. श्याम गुप्त

इस धारा “अगीत” का प्रवर्तन सन १९६६ ई. में काव्य की सभी धाराओं मे निष्णात, कर्मठ व उत्साही वरिष्ठ कवि आ. रंग नाथ मिश्र’सत्य’ ने लखनऊ से किया।तब से यह विधा, अगणित कवियों, साहित्यकारों द्वाराविभिन्न रचनाओं,काव्य-सन्ग्रहों, अगीत -खन्ड-काव्यों व महा काव्योंआदि से सम्रद्धि के शिखर पर्ब चढती जारही है।
इस प्रकार निश्चय ही अगीत, अगीत के प्रवर्तक डा. सत्य व अगणित रचनाकार ,समीक्षक व रचनायें, निराला-युग से आगे, हिन्दी, हिन्दी सा्हित्य,व छन्द शास्त्र के विकास की अग्रगामी ध्वज व पताकायें हैं, जिसे अन्य धारायें, यहां तक कि मुख्य धारा गीति-छन्द विधा भी नहें उठापाई; अगीत ने यह कर दिखाया है,और इसके लिये क्रत-संकल्प है।

———डा. श्याम गुप्त
के-३४८, आशियाना, लखनऊ-२२६०१२.
मो. ०९४१५१५६४६४.

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